Welcome first Time

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई 

जैसे एहसान उतारता है कोई 



आईना देख के तसल्ली हुई 

हम को इस घर में जानता है कोई 



पक गया है शज़र पे फल शायद 

फिर से पत्थर उछालता है कोई 



फिर नज़र में लहू के छींटे हैं 

तुम को शायद मुग़ालता है कोई 



देर से गूँजतें हैं सन्नाटे 

जैसे हम को पुकारता है कोई





          



               दिन है भयानक और रात डरानी
                      यूँ गुज़री सारी ये जवानी


कुछ लोगों को लगता है 
उनकी चालाकियां मुझे समझ में नहीं आती
मैं बड़ी खामोशी से देखता हूं 
उनको अपनी नजरों से गिरते हुए।।
       Thanku so much dear for aal this read 
   How  are after feel this lines just comment it 

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